ग्रामीण बैंक में करोड़ों के लोन घोटाले में सीबीआई का एफआईआर से इंकार
हिमाचल प्रदेश ग्रामीण बैंक की नालागढ़ शाखा में हुए करोड़ों के ऋण घोटाले में सीबीआई ने जांच बंद कर दी है। करीब तीन साल बाद केंद्रीय जांच एजेंसी ने सीआरपीसी की धारा 219 का हवाला देते हुए मामला दर्ज करने से इंकार किया है। सूत्रों के मुताबिक केंद्रीय जांच एजेंसी के मुख्यालय से रिपोर्ट मिलने के बाद मामला बैंक को लौटा दिया गया है।
प्रारंभिक जांच में पता चला था कि बैंक की नालागढ़ शाखा के तत्कालीन अधिकारियों ने फर्जी तरीके से करीब चार करोड़ के लोन बांट दिए, जिनकी भविष्य में अदायगी नहीं हो पाई। वर्ष 2016-17 में बैंक प्रबंधन ने मामले की शिकायत सीबीआई से की। मामले में आरोपियों के खिलाफ कार्रवाई करने की मांग की गई थी। मामला केंद्रीय जांच एजेंसी की शिमला शाखा के पास पहुंचने के बाद इसकी प्रारंभिक जांच शुरू हुई।
सामने आया था कि बैंक प्रबंधन ने नियमों को दरकिनार कर करोड़ों के लोन बांट दिए हैं। इसमें एक ही परिवार के दस सदस्यों को लाखों के लोन दे दिए गए। प्रारंभिक जांच के बाद मामला दर्ज करने की स्वीकृति के लिए फाइल सीबीआई मुख्यालय को भेजी गई, मगर सीआरपीसी की धारा 219 का हवाला देते हुए केस दर्ज करने से इंकार कर दिया गया।
कानून के जानकारों के मुताबिक सीआरपीसी की धारा 219 ट्रायल से संबंधित है, जबकि किसी भी जांच एजेंसी पर यह प्रभावी नहीं होती है। इसके मुताबिक अगर किसी भी शख्स ने एक साल की समय अवधि में तीन से अधिक एक ही तरह के अपराध किए हैं तो उसकी एक ही ट्रायल में जांच नहीं हो सकती है। इसके लिए अलग-अलग मामले दर्ज करने होंगे।
बैंक में हुए फर्जीवाड़े में भी तीन से अधिक बार लोन आवंटित किए गए थे। ऐसी स्थिति में जांच एजेंसी एक से अधिक केस दर्ज कर सकती थी, मगर कोई भी जांच एजेंसी इसका हवाला देकर केस दर्ज करने से इंकार नहीं कर सकती है। ऐसे में सीबीआई के केस दर्ज नहीं करने की प्रक्रिया को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं।
सीबीआई से मामला वापस आने के बाद हिमाचल ग्रामीण बैंक प्रबंधन अब मामले में कानूनी सलाह ले रहा है। इसके बाद ही मामले में आगामी कार्रवाई की जाएगी। हालांकि, बैंक प्रबंधन इस मामले में कुछ भी बोलने से बच रहा है
प्रारंभिक जांच में पता चला था कि बैंक की नालागढ़ शाखा के तत्कालीन अधिकारियों ने फर्जी तरीके से करीब चार करोड़ के लोन बांट दिए, जिनकी भविष्य में अदायगी नहीं हो पाई। वर्ष 2016-17 में बैंक प्रबंधन ने मामले की शिकायत सीबीआई से की। मामले में आरोपियों के खिलाफ कार्रवाई करने की मांग की गई थी। मामला केंद्रीय जांच एजेंसी की शिमला शाखा के पास पहुंचने के बाद इसकी प्रारंभिक जांच शुरू हुई।
सामने आया था कि बैंक प्रबंधन ने नियमों को दरकिनार कर करोड़ों के लोन बांट दिए हैं। इसमें एक ही परिवार के दस सदस्यों को लाखों के लोन दे दिए गए। प्रारंभिक जांच के बाद मामला दर्ज करने की स्वीकृति के लिए फाइल सीबीआई मुख्यालय को भेजी गई, मगर सीआरपीसी की धारा 219 का हवाला देते हुए केस दर्ज करने से इंकार कर दिया गया।
कानून के जानकारों के मुताबिक सीआरपीसी की धारा 219 ट्रायल से संबंधित है, जबकि किसी भी जांच एजेंसी पर यह प्रभावी नहीं होती है। इसके मुताबिक अगर किसी भी शख्स ने एक साल की समय अवधि में तीन से अधिक एक ही तरह के अपराध किए हैं तो उसकी एक ही ट्रायल में जांच नहीं हो सकती है। इसके लिए अलग-अलग मामले दर्ज करने होंगे।
बैंक में हुए फर्जीवाड़े में भी तीन से अधिक बार लोन आवंटित किए गए थे। ऐसी स्थिति में जांच एजेंसी एक से अधिक केस दर्ज कर सकती थी, मगर कोई भी जांच एजेंसी इसका हवाला देकर केस दर्ज करने से इंकार नहीं कर सकती है। ऐसे में सीबीआई के केस दर्ज नहीं करने की प्रक्रिया को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं।
सीबीआई से मामला वापस आने के बाद हिमाचल ग्रामीण बैंक प्रबंधन अब मामले में कानूनी सलाह ले रहा है। इसके बाद ही मामले में आगामी कार्रवाई की जाएगी। हालांकि, बैंक प्रबंधन इस मामले में कुछ भी बोलने से बच रहा है

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